“इब्तिदा”
फिर इक सफ़र की इब्तिदा कितने सफ़र की मंज़िलें
इक पाँव आगे को बढ़ा पिछला क़दम थमता लगे
दो चार दिन की कश्मकश दो चार पल का राब्ता
फिर से पुरानी याद में दिल बे-वजह रमता लगे
कुछ ख़्वाब अटके से लगें फिरकी में आ कर वक़्त की
ये सोचते हैं मैं चलूँ मैं सोचता हूँ ये चलें
वो शाम को कहते हैं मुझ से सुब्ह आई ही नहीं
अब राह ताकूँ रात की ये अब ढले या तब ढले
चलना पड़ेगा उम्र भर इक बार जो इक डग भरा
माज़ी चलेगा संग-संग अब दिल जले या जाँ जले
— Surendra Bhatia "Salil"















