आप चलिए तो सही हम भी चले आते हैं
आप हर बार यही कह के चले जाते हैं
किसी अहबाब से उम्मीद कोई क्या मैं रखूँ
वो कहाँ मेरे मसाइल को समझ पाते हैं
ज़िन्दगी हम तिरे क़ैदी हैं रिहा हम को न कर
हम जुदाई के तसव्वुर से ही घबराते हैं
बात पेचीदा किए जाती है उलझन अपनी
आप जब दूर बिठा कर हमें समझाते हैं
वक़्त अच्छा हो तो फूलों से महकती है सबा
जो बुरा वक़्त हो तो फूल भी मुरझाते हैं
हम ने माना तिरी दुनिया के नज़ारे हैं हसीन
कुछ भी हो हम तिरे झाँसे में नहीं आते हैं
धूप जो तेज़ हो तो ख़ुद को बचाने के लिए
हम उमूमन तेरे साए से लिपट जाते हैं
— Sanjay Bhat














