आता नहीं है वक़्त पे कोई नज़र मुझे
सब दोस्त तंग-दिल हैं नहीं थी ख़बर मुझे
इस ज़िंदगी ने मुझ से किया है यही गिला
क्या ही दिया है आप ने शाम-ओ-सहर मुझे
क्यूँ यूँ हुआ मैं ज़ीस्त की हलचल से डर गया
यूँ तो बहुत से लोग मिले मोतबर मुझे
मैं तो ये चाहता हूँ कि तू साथ साथ हो
तुझ बिन न रास आएगा ये दर ये घर मुझे
अच्छा हुआ जो राह में तू ही मुझे मिला
इक तू ही चाहिए था शरीक-ए-सफ़र मुझे
— Sanjay Bhat















