ख़ुद को खो कर भी तेरा हिस्सा न बना
ज़ोर बहुत मारा मेरा रस्ता न बना
मैं ने पूछा था हल अपनी ग़रीबी का
बात में बात न थी कोई फ़ित्ना न बना
देता रहता है तू दर्द सभी को यहाँ
मेरा कोई भी दर्द मगर शो'ला न बना
एक ही रोटी खाई बाँट के यूँ हम ने
ग़ुर्बत में भी देख कोई क़िस्सा न बना
वक़्त की शाख़ों को तो हिलाता हूँ लेकिन
गिरता फिर वो पल वैसा लम्हा न बना
— Sanjay Bhat















