मंज़िल न हासिल हो तो दिल का ज़ोर क्या
मिल ही गई मंज़िल तो फिर ये शोर क्या
ये धूप से चेहरा हुआ जाता है सुर्ख़
या आप ने देखा है मेरी ओर क्या
हर एक इंसाँ ज़र्द सा क्यूँ है यहाँ
उड़ ही गया है सब के दिल का मोर क्या
देखो जिसे भी वो लगे मुजरिम की तरह
इस दिल के ही अंदर छुपा है चोर क्या
चारों तरफ़ है बस ज़र-ओ-दौलत की होड़
लालच का कोई भी नहीं है छोर क्या
दिल भर गया है मेरा इस दुनिया से अब
तो अब चलूँ मैं भी तिरी ही ओर क्या
— Sanjay Bhat















