बुझा चराग़ तोड़ना ज़रूरी तो नहींहवा के ज़ोर से बुझी है रौशनी मिरीतू फिर से मुझ को लौ लगा के देख ले ज़राचमक उठेगी फिर ये शाम-ए-ज़िंदगी तिरी— Sanjay Bhat