कभी मैं सामने रख कर भी मंज़र लिख नहीं पाता
वो सच जो सब को दिखता है मुझी को दिख नहीं पाता
ज़रूरी है कि जीवन में रहे कुछ तो परेशानी
ज़ियादा रौशनी हो तो नज़ारा दिख नहीं पता
मैं कैसे लिख के दूँ तुझ को ख़ुशी पे नज़्म कोई भी
सुकून-ए-वस्ल में भी तो कोई दुख लिख नहीं पाता
— Santy sharma















