
इस दुनिया की रीति-रस्में न जाने क्यूँ ऐसी हैं
धर्म -जाति संग प्यार पिसेगा ये अफवाएँ कैसी हैं
दूर क्षितिज पर मिलते तो है मिलन मगर नामुमकिन है
तेरी-मेरी हालत जानम धरती अंबर जैसी हैं
— Sanya rai
Other sher from the same pen
Shers of duniya.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling