देखो ख़ामोश हैं सारे ये नगर कौन बचाए
दिखता तो है सभी को ज़ुल्म मगर कौन बचाए
आज सोए हैं सभी के सभी इंसान यहाँ पर
एक मासूम का जलता हुआ घर कौन बचाए
अब किसी और से डरने की ज़रूरत नहीं पड़ती
अब है इंसान को इंसान का डर कौन बचाए
क्या गिला हम करें सारे जहाँ से कोई बताओ
ज़ेहन है अपना ही कोताह-नज़र कौन बचाए
मैं किसी और ज़माने में चला आया हूँ शायद
हर तरफ़ है ये सियासत का भँवर कौन बचाए
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