ye aur baat hai koi gin nahin raha | ये और बात है कोई गिन नहीं रहा

  - Shadab khan

ये और बात है कोई गिन नहीं रहा
ये वक़्त ख़ास जो तेरे बिन नहीं रहा

है सारे शहर में तुझको याद कर रहे
मेरे शुमार में तो ज़ामिन नहीं रहा

अब हो सके यहाँ से पहले निकल चलें
अब रात हो रही है अब दिन नहीं रहा

वो दौर और ही था हम थे मुरीद जब
अब 'इश्क़ का मुसल्लत तो जिन नहीं रहा

ये और बात है तू खाता रहा क़सम
अफ़सोस अब भरोसा लेकिन नहीं रहा

  - Shadab khan

Shahr Shayari

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