वो बिछड़ने पे भी दिखाई दे
इश्क़ ऐसी नहीं रिहाई दे
छू ले गर वो मैं ठीक हो जाऊँ
जाने क्यूँ हफ्तों तक दवाई दे
घंटों ख़ामोश फोन पर हो तुम
बात क्लियर मुझे सुनाई दे
ज़ख़्म की देख भाल क्यूँ हो अब
इक भरे दूसरा दुहाई दे
कौन देता ग़रीब को इज़्ज़त
तू अमीरों को ही बधाई दे
— Shadab khan















