अपने होंठों पे तबस्सुम लिए वो कहता है
बे तकल्लुफ़ करो मुझसे जो कोई शिकवा है
कोई शीरीं है कोई हीर कोई लैला है
कोई फ़रहाद कोई क़ैस कोई राँझा है
जब से देखा है सनम ख़्वाब में सहरा मैंने
तब से दिल में तुझे खो देने का डर रहता है
ख़ूबसूरत है बहुत चेहरे से वो शख़्स मगर
है मुनाफ़िक़ है फ़रेबी वो मियाँ झूठा है
चार चीज़े हैं मेरे कमरे में रब ख़ैर करे
मैं हूँ तन्हाई है ये रस्सी है और पंखा है
मेरे माबूद इसे उम्र-ए-अबद दे देना
शाख़-ए-दिल पर ये मोहब्बत का जो गुल खिलता है
अच्छा अच्छा ये बता मुझको ज़रा जान-ए-वफ़ा
तू जिसे चाहती है मुझसे हसीं लड़का है
देखकर हाथ मेरा मुझसे नजूमी ने कहा
तेरी तक़दीर में रुसवाई है और सहरा है
गुल का बोसा मैं लिया करता हूँ गुलशन में शजर
और ये देख के ख़ारों का जिगर जलता है
तैश में आन के सखियों से ये बोली इक दिन
मैं शजर की हूँ सुनो और शजर मेरा है
उसने ये कह के शजर दूरी बना ली मुझसे
कौन रुसवा-ए-ज़माना से गले मिलता है
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