कर दिया तर्क यूँँ इबादत को
तुम न आए मेरी अयादत को
उसने रुख़ से ना पलटी अपने नक़ाब
हम तरसते रहे ज़ियारत को
ये मोहब्बत भी इक इबादत है
क्यूँ क़ज़ा कर दूँ इस इबादत को
ज़िन्दगी पर तुम्हारी लानत है
उठ ना पाए मेरी हिमायत को
इस सियासत ने घर जला डाले
आग लग जाए इस सियासत को
सब मकाँ शहर में बराबर है
ज़लज़ला ढा गया इमारत को
उसने अपनी हया के पर्दे में
क़ैद कर रक्खा है क़यामत को
जिनको मैंने सुखन सिखाया था
उठ रहे हैं वही बग़ावत को
हक़ बयानी तो मेरी आदत है
क्यूँ बदल दूँ मैं अपनी आदत को
जो निकम्मी हो सुनिए औलादें
बेचती हैं वहीं विरासत को
मैं शजर हूँ जुदा हूँ दुनिया से
तुम ना समझोगे मेरी तीनत को
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