बर्बाद बाग़बान का ऐसे चमन हुआ
ख़ारों से छलनी सारे गुलों का बदन हुआ
लफ़्ज़-ए-कफ़न से हमने हटाया है काफ़ को
तब जाके यार लफ़्ज़-ए-कफ़न लफ़्ज़-ए-फ़न हुआ
हमने किया है दीद सनम माहताब का
फुर्क़त के बाद दीद का जब तेरे मन हुआ
सहरा में कोई लाशे पे गिर्या कुनाँ है यूँँ
अफ़सोस है तुम्हें न मय्यसर कफ़न हुआ
बस्ती के कूचे कूचे में ये शोर-ओ-शैन हैं
हाए शजर भी आज ग़रीब-उल-वतन हुआ
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