वो जिस जिस का भी हमदम हो रहा है
हर इक बन्दा वो मोहकम हो रहा है
ग़ज़ल में दर्द अपना लिख रहा हूँ
तो मेरा दर्द कुछ कम हो रहा है
शब-ए-महताब ये क्या माजरा है
रूख़-ए-महताब मद्धम हो रहा है
जो ख़म होता न था आगे किसी के
तेरे आगे वो सर ख़म हो रहा है
ये मेरा दिल नहीं धड़के है पागल
तेरी फ़ुर्क़त का मातम हो रहा है
हमारे दोस्तों में अक़रिबा में
तुम्हारा ज़िक्र हर दम हो रहा है
वो अपनी ज़ुल्फ़ को लहरा रही है
हसीं यूँँ आज मौसम हो रहा है
ज़माना देख के हैरत ज़दा है
मेरा दुश्मन क्यूँँ हमदम हो रहा है
मता-ए-जाँ तुम्हारा मुस्कुराना
मेरे ज़ख़्मों का मरहम हो रहा है
क़दम जिस आब में वो रख रही है
शजर वो आब-ए-ज़मज़म हो रहा है
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