vo jis jis ka bhi hamdam ho raha hai | वो जिस जिस का भी हमदम हो रहा है

  - Shajar Abbas

वो जिस जिस का भी हमदम हो रहा है
हर इक बन्दा वो मोहकम हो रहा है

ग़ज़ल में दर्द अपना लिख रहा हूँ
तो मेरा दर्द कुछ कम हो रहा है

शब-ए-महताब ये क्या माजरा है
रूख़-ए-महताब मद्धम हो रहा है

जो ख़म होता न था आगे किसी के
तेरे आगे वो सर ख़म हो रहा है

ये मेरा दिल नहीं धड़के है पागल
तेरी फ़ुर्क़त का मातम हो रहा है

हमारे दोस्तों में अक़रिबा में
तुम्हारा ज़िक्र हर दम हो रहा है

वो अपनी ज़ुल्फ़ को लहरा रही है
हसीं यूँँ आज मौसम हो रहा है

ज़माना देख के हैरत ज़दा है
मेरा दुश्मन क्यूँँ हमदम हो रहा है

मता-ए-जाँ तुम्हारा मुस्कुराना
मेरे ज़ख़्मों का मरहम हो रहा है

क़दम जिस आब में वो रख रही है
शजर वो आब-ए-ज़मज़म हो रहा है

  - Shajar Abbas

Intiqam Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Shajar Abbas

As you were reading Shayari by Shajar Abbas

Similar Writers

our suggestion based on Shajar Abbas

Similar Moods

As you were reading Intiqam Shayari Shayari