गुलशन में बाग़बाँ के शोले भड़क रहे हैं
आँखों से देखो गुल की आँसू टपक रहे हैं
तोहफ़े में उसने मुझको काग़ज़ के जो दिए थे
ये देख मोजिज़ा तू वो गुल महक रहे हैं
तस्वीर को तुम्हारी आँखों में अपनी लेकर
हम सुब्ह-ओ-शाम दिलबर दर दर भटक रहे हैं
रहते हैं दूर हम तो मयख़्वारी मयकदे से
क्या माजरा है या रब हम क्यूँ बहक रहे हैं
सहरा में देखो मुर्शिद सदियों से लेके अब तक
चादर से ख़ाक की हम ज़ख्मों को ढक रहे हैं
चेहरे से अपने उसने बख़्शा है नूर इनको
सूरज क़मर सितारे सब यूँँ चमक रहे हैं
लगता है आ गए हैं परदेस से वो वापस
हमसाए के मकाँ में कंगन खनक रहे हैं
बाद-ए-फिराक़-ए-हमदम ये हाल हो गया है
दीवार-ओ-दर में अपना हम सर पटक रहे हैं
सदियाँ गुज़र चुकी हैं ऐ आने वाले आ जा
पलके बिछा के आशिक़ सब रस्ता तक रहे हैं
गुलशन में आ के देखो शबनम हैं गुल के लब पर
शाख़-ए-शजर पे बैठे पंछी चहक रहे हैं
मंज़र ये दिख रहा है हुक्म-ए-बयाज़ी पाकर
हिजरत शजर ने कर दी पत्थर धड़क रहे हैं
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