idhar udhar ko na jaaun to phir kidhar jaaun | इधर उधर को न जाऊँ तो फिर किधर जाऊँ

  - Shajar Abbas

इधर उधर को न जाऊँ तो फिर किधर जाऊँ
ऐ रहनुमा ये बता दे मुझे मैं मर जाऊँ

मुझे यक़ीन है उसके लबों में जादू है
अगर वो चूम ले मुझको तो मैं निखर जाऊँ

तू मेरे जिस्म में एक रूह सी उतर जाए
मैं तेरे जिस्म में एक रूह सा उतर जाऊँ

मेरा मज़ार हो उसके दयार के आगे
मैं चाहता हूँ मैं कू-ए-बुताँ में मर जाऊँ

तुम्हारे नाम से जाने मुझे ये सारा जहाँ
मैं इस जहाँ में मेरी जाँ जिधर जिधर जाऊँ

ख़ुदा के डर से नहीं डरते ये जहाँ वाले
तो किस लिए मैं ज़माने के डर से डर जाऊँ

जनाब-ए-क़ैस अलैहिस्सलाम जैसे गए
मैं ऐसे हाल में दुनिया में दर-ब-दर जाऊँ

दयार-ए-ग़ैर में लूटा है रहज़नों ने मुझे
मेरा तो घर भी नहीं हैं यहाँ किधर जाऊँ

जो राह-ए-इश्क़ में फ़रहाद-ओ-क़ैस कर न सके
ख़याल आता है दिल में कुछ ऐसा कर जाऊँ

बताओ मुझसे हक़ीक़त में प्यार करते हो
तू मुझसे आन के पूछे ये मैं मुकर जाऊँ

हमेशा जाने से पहले वो पूछा करती थी
अगर कहो मुझे जाने को तो शजर जाऊँ

  - Shajar Abbas

Khuda Shayari

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