jab se yaarab meri maa KHaamosh hai | जब से यारब मेरी माँ ख़ामोश है

  - Shajar Abbas

जब से यारब मेरी माँ ख़ामोश है
लग रहा है ये जहाँ ख़ामोश है

जबसे इक बन्दा यहाँ ख़ामोश है
तब से इक बन्दा वहाँ ख़ामोश है

मुस्तक़िल जो बोलता था देखिए
आज वक़्त-ए-इम्तिेहाँ ख़ामोश है

मौत से महफूज़ है वो इस लिए
क्योंकि उसका राज़दाँ ख़ामोश है

शह-रग-ए गुल से निकलता है धुआँ
और देखो आसमाँ ख़ामोश है

ख़ार छलनी कर रहे हैं जिस्म-ए-गुल
और हैरत बागबाँ ख़ामोश है

किस तरह महफ़िल ये महफ़िल सी लगे
यार महफ़िल में फ़ुलाँ ख़ामोश है

शहर-ए-ख़ामोशाँ सा लगता है जहाँ
जब से वो इक ख़ुश ज़बाँ ख़ामोश है

किस तरह टूटे ये आँगन का सुकूत
तू भी चुप है और समाँ ख़ामोश है

मर गया हूँ मैं फ़िराक़-ए-यार में
तू शजर क्यूँ ख़ामा ख़्वाँ ख़ामोश है

  - Shajar Abbas

Urdu Shayari

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