मुँह को आता है कलेजा मेरी जाँ जाती है
यार एक याद है जो ज़ेहन मेरा खाती है
ईद के दिन की तरह ख़ुशियाँ मनाते हैं सभी
लौटकर गाँव को वो शहर से जब आती है
गुलशन-ए-क़ल्ब में खिल जाते हैं उल्फ़त के गुलाब
अपने हमराह में वो ऐसी बहार लाती है
अपनी सखियों को अज़ीज़ों को ये बतला देना
जो तुम्हें चाहता है लड़का वो देहाती है
चैन तन्हाई को मिलता ही नहीं और कहीं
ये मेरी बाहों में आकर ही सुकूँ पाती है
नौजवाँ लम्हों में हो जाते है ज़ुल्फ़ों के असीर
अपनी ज़ुल्फें वो अगर खोल के लहराती है
देख लेती हैं मेरी सिम्त जो सखियाँ उसकी
अपनी सखियों पे बड़े तेश से चिल्लाती है
'आप' 'वो' 'जी' मुझे कहती है हमेशा यारों
नाम लेने में मेरा शर्म उसे आती है
अश्क़ आँखों में लिए देखो मुसल्ले पे 'शजर'
एक लड़की मेरी चाहत में मुनाजाती है
रात भर एड़ियाँ बिस्तर पा रगड़ता हूँ शजर
नींद की गोलियाँ खाकर मुझे नींद आती है।
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