rakhi hai laaj aise sadaa etibaar kii | रक्खी है लाज ऐसे सदा एतिबार की

  - Shajar Abbas

रक्खी है लाज ऐसे सदा एतिबार की
हमने वफ़ा की उनसे शजर बे शुमार की

करते हैं इंतिज़ार तिरा बस ये सोचकर
शायद ये इंतिहा हो तिरे इंतिज़ार की

उस ख़ूबरू से चेहरे के दीदार के सिवा
कोई दवा बताओ दिल ए बे क़रार की

तीर ओ तबर पे शाम के इन सूरमाओं पर
हावी है रन में देखो हँसी शीर ख़्वार की

हम अपने दिल के हाथों थे मजबूर ऐ शजर
हमने हर इक ख़ता यूँँ तिरी दर किनार की

  - Shajar Abbas

Shaam Shayari

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