"हैरत"
हुस्न महव-ए-हैरत है
आज माजरा क्या है
इश्क़ के मुसल्ले पर
आज हज़रत-ए-दिल ने
अपने पाँव रक्खे हैं
आज हज़रत-ए-दिल को
क्या हुआ है रब जाने
जो हमेशा दामन को
हुस्न से बचाते थे
आज बा-वुज़ू होकर
इश्क़ के मुसल्ले पर
कैसे आ गए हैं वो
हुस्न महव-ए-हैरत है
— Shajar Abbas















