"शिकवा-ए-फ़िलिस्तीन"
बाक़ी है दिल में थोड़ी सी इंसानियत अगर
अहल-ए-नज़र तो करिए फ़िलिस्तीन पे नज़र
जलते हुए ख़याम ये उठता हुआ धुआँ
टूटे हुए मकान ये वीरान बस्तियाँ
कुछ कह रही हैं अहल-ए-जहाँ ग़ौर से सुनो
मज़लूम कर रहे हैं बयाँ ग़ौर से सुनो
बाक़ी है दिल में थोड़ी सी इंसानियत अगर
अहल-ए-नज़र तो करिए फ़िलिस्तीन पे नज़र
हर रोज़ सुब्ह-ओ-शाम याँ बे-जुर्म-ओ-बे-ख़ता
होती है बे-गुनाहों पे बे-इंतिहा जफ़ा
मेरा मुतालबा है हर इक हक़-शनास से
मरते हैं रोज़ लोग यहाँ भूख प्यास से
मंज़र ये देख देख के दम घुटता है मिरा
माँएँ पिसर की लाश पे पढ़ती हैं मर्सिया
आती है शौर-ओ-शैन की हर सिम्त से सदा
तिफ़्ल-ओ-जवान बूढ़ों के लाशे हैं जा-ब-जा
कोई नहीं है बेकस-ओ-मुज़्तर का हम-नवाँ
ज़ुल्म-ओ-सितम ये देख के ख़ामोश है जहाँ
कहते हैं ख़ुद को उम्मत-ए-मुस्लिम का रहनुमा
हामी नहीं है कोई मुसीबत में पर मिरा
अहल-ए-अरब से आज ये मेरा ख़िताब है
शिकवे का मेरे क्या कोई तुम पर जवाब है















