क़ल्ब-ए-अलील की है ये हसरत मता-ए-जाँ
करने तुम आओ इसकी अयादत मता-ए-जाँ
दिल में हैं गर ख़्याल-ए-मोहब्बत मता-ए-जाँ
वाजिब है तुम पे लैला की बैअत मता-ए-जाँ
बस ज़िक्र है ये बज़्म-ए-सुख़न-वर में रात दिन
मिलती है तेरी चाँद से सूरत मता-ए-जाँ
जब से सुना हैं हमसे मोहब्बत है आपको
सब कर रहे हैं यार ये हैरत मता-ए-जाँ
मर जाऊँ मैं तो रोना नहीं याद में मेरी
तुमसे ये आख़िरी है वसीयत मता-ए-जाँ
साँसों की जिस तरह से ज़रूरत है जिस्म को
मुझको है ऐसे तेरी ज़रूरत मता-ए-जाँ
आ जाना मुझसे करने मुलाक़ात ख़्वाब में
मिल जाए तुझको थोड़ी जो फ़ुर्सत मता-ए-जाँ
दीदार कर के चाँद से चेहरे का आपके
दिल को हमारे मिलती है राहत मता-ए-जाँ
गोदी तुम्हारी खुशियों से हर दम भरी रहे
रब की हो तुम पे ख़ूब इनायत मता-ए-जाँ
महव-ए-दुआ है हक़ में तेरे रब से यूँ 'शजर'
तुझ पर कोई ना आए मुसीबत मता-ए-जाँ
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