साहिब-ए-शर तो कहीं साहिब-ए-किरदार मिले
मुझको अहबाब भी क़िस्मत से अदाकार मिले
चेहरा-ए-चश्म से जब उल्टा यक़ीं का पर्दा
सफ़ में अग़्यार की सब बैठे हुए यार मिले
सूक़ की सिम्त को जाता हूँ दुआएँ करना
मुझको यूसुफ़ की तरह कोई ख़रीदार मिले
हज़रत-ए-दिल का जिगर चीर के रख डालेगी
नौ-जवानी को अगर हुस्न की तलवार मिले
मेरे महबूब के कूचे का पता दे देना
राह में गर कोई जन्नत का तलबगार मिले
भूख और धूप को अब और नहीं सह सकता
कोई सहरा में शजर मुझको समर-दार मिले
Read Full