जब से दिल की लुट गई है राजधानी हाए हाए
है हयात-ए-शा'इरा भी राएगानी हाए हाए
पेश-ए-ख़िदमत है हमारा ये दिल-ए-नाज़ुक हुज़ूर
इस पे चाहे जैसे करिए हुक्मरानी हाए हाए
दस्त बस्ता इल्तिजा है कुछ तो बोलो जान-ए-दिल
जान ले लेगी तुम्हारी बे-ज़बानी हाए हाए
ख़्वाब-ए-ग़फ़लत में गँवा कर कुल हयात-ए-जाविदाँ
कर रहे हैं अब मलाल-ए-ज़िंदगानी हाए हाए
हो रही हों जैसे बे मौसम शरर की बारिशें
ऐसी लगती है हमें ये गुल-फ़िशानी हाए हाए
मर के राह-ए-इश्क़ में देखो ज़रा बाद-ए-क़ज़ा
क़ैस ने पा ली हयात-ए-जावेदानी हाए हाए
है बपा सीने में मातम अब दिल-ए-मरहूम का
ख़त्म मुर्शिद हो गई है सोज़-ख़्वानी हाए हाए
हुस्न वाले लूट लेंगे सब तेरा चैन-ओ-सुकूँ
गर दिल-ए-नादाँ करेगा मेज़बानी हाए हाए
'इश्क़ की तारीख़ में ऐ बादशाह-ए-सल्तनत
आशिक़-ए-बदनाम पर ये मेहरबानी हाए हाए
गुलशन-ए-ना-आफ़रीदा की निगाह-ए-ग़ौर से
रोज़ करते हैं शजर क्यूँँ बाग़बानी हाए हाए
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