'इश्क़ गर तेरा मसअला है दिल
तो समझ रोग ये बुरा है दिल
हुस्न पर उसके मत चले जाना
वो हसीं शख़्स बे वफ़ा है दिल
देख कर हाल ऐसा लगता है
हिज्र की आग में जला है दिल
चश्म की शाख़ पर ख़यालों का
इक नया फूल खिल चुका है दिल
हुस्न वालों के रू ब रू अपना
सर झुकाए हुए खड़ा है दिल
रात दिन सुब्ह शाम सीने में
एड़ियों को रगड़ रहा है दिल
तेरी तस्वीर ले के आँखों में
घुट के सीने में मर गया है दिल
ख़ुद को महफ़ूज़ कर ले तू इससे
ये मुहब्बत बुरी बला है दिल
ग़ालिबन वो शजर हमारा है
ख़ून में तर जो वाँ पड़ा है दिल
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