अगर जो आज मैं लैला के क़र्या जाऊँगा
तो जानता हूँ के पत्थर से मारा जाऊँगा
यक़ीन होने लगा अब तेरी मुहब्बत में
मैं रुसवा करके वतन से निकाला जाऊँगा
लबों पे शिकवा सजा होगा तेरी फुर्क़त का
ख़ुदा के सामने जिस दिन बुलाया जाऊँगा
लकीर हाथ की पढ़कर कहा नजूमी ने
मैं इक हसीना की चाहत में मारा जाऊँगा
वो पल हयात का सबसे हसीन पल होगा
तुम्हारा कह के मैं जिस पल पुकारा जाऊँगा
उधर उठेगी तेरी डोली तेरे आँगन से
बरा-ए-दफ़्न इधर मैं उठाया जाऊँगा
सुकून होता है हासिल शजर वहाँ जाकर
मज़ार-ए-क़ैस पे मैं फिर दुबारा जाऊँगा
Read Full