वो डरें क्यूँँ ही बिखरते रिश्तों से
रब्त है जिन को मिरी नम आँखों से
इक लड़ी मोती सी ठहरी गालों पे
अश्क बन जब ख़ून टपका आँखों से
यूँ तो ये मौसम नहीं पतझड़ के अब
फिर भी पत्ते झड़ते हैं इन शाख़ों से
कुछ तो मजबूरी रही होगी तभी
तोड़ आए सारे बंधन अपनों से
राज था जिन का मुहब्बत पर कभी
जी रहे हैं ग़म में वो भी सदियों से
था मुक़द्दर में समुंदर सारा ही
पर गुज़ारा कर रहे कुछ क़तरों से
— Shams Amiruddin















