चाहूँ मैं तो भी नहीं टलती बला इक
इस तरह से मुझ में है उलझी बला इक
चाहती है जब मसल देती है मुझ को
मेरे अंदर सदियों से पलती बला इक
शाम ढ़लते ही निकल आता हूँ पीने
यूँ है मुझ में फूलती-फलती बला इक
चलते-चलते लड़खड़ा जाता हूँ अक्सर
जब मचलती है मिरी प्यासी बला इक
— Shams Amiruddin















