देखना याद अब उसकी न कहीं जाने लगे
दर्द बढ़ता रहे जब तक न मज़ा आने लगे
मेरी हालत पे तरस को भी तरस आने लगे
इतना ग़म हो कि मैं चीख़ूँ तो वो लौट आने लगे
ऐ ख़ुदा याद वो आए तो ख़ुद अपने ही लिए
इतना ज़ालिम मैं बनूँ ज़ुल्म भी घबराने लगे
ये जो बेबाक हुईं फिरती हैं, मूरत है फ़क़त
हुस्न तो वो है जो घूँघट में भी शर्माने लगे
नौकरी वाले की ख़ातिर मुझे छोड़ा उसने
कामयाब इतना बनूँगा कि वो पछताने लगे
सिर्फ़ मैं मौत तलक कहता रहूँगा ग़ज़लें
यानी जब तक न उसे मेरी भी याद आने लगे
वैसे तो मैं कभी भी याद न आऊँगा मगर
याद तब आऊँगा तू जब किसी को पाने लगे
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