lagaane the jo vo marham bache hain | लगाने थे जो वो मरहम बचे हैं

  - SHIV SAFAR

लगाने थे जो वो मरहम बचे हैं
हमारे बीच अब भी ग़म बचे हैं

मुझे होने लगी है फ़िक्र तेरी
हमारे साथ के दिन कम बचे हैं

ज़मी से मिट चुके इंसान कब के
पे तह-ख़ानों में अब तक बम बचे हैं

तुम अब तुम और मैं मैं हो गया हूॅं
ज़रा सा भी नहीं अब हम बचे हैं

तेरे एहसासों में से पास मेरे
बचे हैं जो वो बस बरहम बचे हैं

जो भीगी डायरी यादों में तेरी
बहुत से हर्फ़ अब तक नम बचे हैं

निभाने रिश्ते निकले सिर जो उन
में
बचे तो हैं मगर कुछ ख़म बचे हैं

  - SHIV SAFAR

Udasi Shayari

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