मुझ को बक़ा करती नहीं
ये ज़ीस्त यूँ मरती नहीं
वो छोड़कर मुझ को गया
चाहत मगर भरती नहीं
वो याद है करती मुझे
कहती मगर डरती नहीं
— Sohit Singla
ये ज़ीस्त यूँ मरती नहीं
वो छोड़कर मुझ को गया
चाहत मगर भरती नहीं
वो याद है करती मुझे
कहती मगर डरती नहीं
Other ghazal from the same pen
Shers of promise.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling