अश्क पलकों पे मेरी सुहाते नहीं
ख़ुश-मिज़ाजी के मौसम भी आते नहीं
कह दिया है ये साक़ी ने भी हम से अब
तुम जो पीते हो वो हम पिलाते नहीं
होगा दीवान-ए-अफ़साना इनसे रक़म
इक ग़ज़ल में तो क़िस्से समाते नहीं
— Sumit Panchal
ख़ुश-मिज़ाजी के मौसम भी आते नहीं
कह दिया है ये साक़ी ने भी हम से अब
तुम जो पीते हो वो हम पिलाते नहीं
होगा दीवान-ए-अफ़साना इनसे रक़म
इक ग़ज़ल में तो क़िस्से समाते नहीं
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