सिवा इस के कोई शिकवा नहीं है
जिसे हम चाह लें मिलता नहीं है
हमारा शे'र क्या कहता नहीं है?
हमारा तजरबा कच्चा नहीं है
तेरा टुकड़ा तो कह सकते हैं उस को
मगर तू चाँद का टुकड़ा नहीं है
हमारा दुख यही है कोई फल फूल
हमारे पेड़ पर फलता नहीं है
मैं चुप बैठा हूँ तो ऐसा नहीं के
तिरा लहजा मुझे चुभता नहीं है
तुम्हें जाता हुआ हम देख लेंगे?
कलेजा है, मगर इतना नहीं है
— Aarush Sarkaar















