वक़्त गुज़रा तो न जाने कैसे हालों में मिलूँगा
ढूँढ़ना तुम को तुम्हारे घर के जालों में मिलूँगा
तुम जो आओ तो अँधेरों से गुज़र के पास आना
मैं तभी शायद तुम्हें बढ़ते उजालों में मिलूँगा
मैं मिलूँगा तुम को रस्ते के किनारे घास जैसे
मैं नहीं हूँ फूल वो जो तुम को बालों में मिलूँगा
तुम भी क्या रातों को जग के देर तक सोती नहीं हो
काश तुम भी ख़्वाब देखो तुम को गालों में मिलूँगा
यूँ डरा हूँ मैं अँधेरे से मुझे है जगमगाना
मैं उजालों के क़रीं जलती मशालों में मिलूँगा
क्या तुम्हें सचमुच मुहब्बत थी अगर थी क्यूँ न पाई
मैं तुम्हें उलझा कुछ ऐसे ही सवालों में मिलूँगा
— Umashankar Lekhwar















