ज़िंदा भी आख़िर हम रहे बिछड़े भी तुम सेे बे-मिले
तो क्या हुआ कुछ लोग हम को जो कभी तुम से मिले
आवारगी ऐसी भी छाई है हमें अफ़सोस है
जो मिल न पाए वो हमें हर राह पे आ के मिले
हम ही थे आवारा या फिर उन को भी हम सा शौक़ था
जिस राह पे भी हम गए उस राह के आगे मिले
पकड़ा हुआ है हाथ जिस का छोड़ मत आना कहीं
तुम छोड़ आओ फिर वो शायद ही कभी तुम से मिले
दिखता नहीं ख़ुद सा यहाँ कोई भी हम को हर तरफ़
तो क्या हुआ जिन को नहीं हम चाहते उन से मिले
— Umashankar Lekhwar















