"मुझे मेरे पथ पर जाने दो"
क्या बस देह से देह मिले
उस को ही परिणय मानोगे
तुम कब भावों से भावों के
गठबंधन को पहचानोगे
कभी सिर्फ़ मधुरिम स्मृति के
कुछ पल भी वो कर जाते हैं
जब दूर बहुत बैठे हो कर भी
मन तृप्त हुए भर जाते हैं
परिभाषाओं के इस झंझट में
मेरी मानो तो मत उलझो
जब शाश्वत को पहचान लिया
तो शब्द को क्या पहचानोगे
विचलित हूँ तनिक मगर मानो
तुम से नहीं ख़ुद से रूठा हूँ
क्यूँ देख नहीं पाती हो तुम
मैं अपनी शाख से टूटा हूँ
थोड़ा सा तो मुझ को भी तुम
ख़ुद से मिलने-बतियाने दो
माना कि राह निराली है
मुझे मेरे पथ पर जाने दो
— Gulshan















