नज़र तुझ सेे मिलाना और बस संसार हो जाना

ज़मानत ज़ब्त मेरी आप का सरकार हो जाना

गली को गाँव खेतों बाग़ को भी छोड़ने वाले
बड़ा ऊँचा समझते शहर में घरबार हो जाना

समर में जो पिता भाई का रथ सम्मुख खड़ा हो तो
धनुष ता'ने हुए अर्जुन का तब लाचार हो जाना

तिरी तल्ख़ी भरे अंदाज़ में बातों को समझाना
मिरी आँखों की बारिश का सनम हरबार हो जाना

कभी घर की अना ख़ातिर बड़ों का रूप होता है
कहीं पानी का बर्तन सा वही आकार हो जाना

— Sarvesh Pandey

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