
कब तक ए यार, जंगल की बाहें काटेगा तू
पर ख़ैर तो अभी, मेरी बातें काटेगा तू
तू ने शजर में बैठे, टहनी जो काटी है ना
इक दिन उसी के सदके में, सांसें काटेगा तू
— Vishal Jha
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