उस मोहब्बत का जुनूँ और ललक बाक़ी है
उसको पाने की मेरे दिल में कसक बाक़ी है
मुझ में मल्बूस है उसके ही बदन की ख़ुश्बू
और साँसों में भी अफ़्सुर्दा महक बाक़ी है
मेरे होंठो का मज़ा कैसे भला बदलेगा
उसकी गर्दन का जो तीखा सा नमक बाक़ी है
लफ़्ज़ बन बन के उभर आते हैं सब उसके निशाँ
उसके मासूम से चेहरे की झलक बाक़ी है
याद करने पे उसे चैन कहाँ पड़ता है
तूर जैसी मेरे सीने में दहक बाक़ी है
मुझको रह रह के सताती है उदासी मेरी
और हिचकी में जुदाई की सिसक बाक़ी है
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