एक ही काम तो करता हूँ मैं
रोज़ भीतर मेरे मरता हूँ मैं
ग़म में जीने की रही है आदत
सो ख़ुशी देख के डरता हूँ मैं
आँखों की प्यास बुझे इस ख़ातिर
आँखों में ख़्वाब भी भरता हूँ मैं
ज़िंदगी भर है समेटा ख़ुद को
थक गया हूँ लो बिखरता हूँ मैं
— Yuvraj Singh Faujdar















