तेरी और मेरी मुलाक़ात के बा'द
इक आँधी सी उट्ठी थी बरसात के बा'द
नया दिन नई आस ले आता लेकिन
सवेरा हुआ ही नहीं रात के बा'द
मेरी बातें जो बीच में काटा करती
वो ख़ामोश क्यूँ है मेरी बात के बा'द
अभी और करनी है हम को मोहब्बत
जनम और भी लेने हैं सात के बा'द
मोहब्बत मुकम्मल ये हो जाने देंगे
इन्हें दिखता है कुछ कभी ज़ात के बा'द
— Yuvraj Singh Faujdar















