ज़िंदगी को आज़ मैं भी ज़िंदगी कर लेता हूँ
बुझ गये हर ज़ख़्म को मैं रौशनी कर लेता हूँ
शे'र अच्छे या ग़ज़ल अच्छी मुझे लिखनी है तो
हुस्न को उसके मैं उसकी सादगी कर लेता हूँ
इस से पहले तेरा रिश्ता हो किसी ग़ाफ़िल से तय
मैं ग़म-ए-जानाँ को अपनी ज़िंदगी कर लेता हूँ
आशिक़ी या शायरी होती नहीं इक साथ तो
आशिक़ी भी छोड़ी सोचा शायरी कर लेता हूँ
ख़ुदकुशी तुझ को गुमाँ है मैं गिला करवाता हूँ
ख़ुदकुशी से ख़ुद मिटाकर मैं ख़ुशी कर लेता हूँ
सोच मत इस बदगुमानी को तू 'योगम्बर' बहुत
हो कहीं मन तेरा मैं भी ख़ुदकुशी कर लेता हूँ
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Yogamber Agri
our suggestion based on Yogamber Agri
As you were reading Shikwa Shayari Shayari