ख़ुश रहना सीखे इंसान
ग़म सहना होगा आसान
अपनी हालत ठीक करूँ
या रक्खूँ अपनों का ध्यान
बहला लेता हूँ ख़ुद को
ख़ुद का ही कर के गुन-गान
मैं जब आपे में आया
लोग हुए मुझ से अनजान
दिल के बा-बरकत घर में
आते जाते हैं मेहमान
सुन मैं तेरा हूँ और बस
इतनी है मेरी पहचान
मत दुनिया में नुक़्स निकाल
ख़ुद का ही होगा नुक़सान
हश्र उठाऊँ तो कैसे
सर पे है बार-ए-एहसान
शहर-ए-ख़िरद में हो कर तुम
दिल में रखते हो अरमान
चीख़ रही है तन्हाई
घर है इस दर्जा सुनसान
हैराँ होना छोड़ ही दूँ
इतना तो मत कर हैरान
घर से दूर है मस्जिद पर
पास पड़े है क़ब्रिस्तान
कोई तो सुनता था मिरी
कौन था वो और कब था 'ज़ान'















