क़ल्ब-ए-ना-शाद की अब ज़रूरत नहीं

सो तिरी याद की अब ज़रूरत नहीं

मुझ को राह-ए-ख़ुदा में ये ख़ल्वत मिली
मुझ को अफ़राद की अब ज़रूरत नहीं

पड़ चुकी है क़फ़स की अब आदत मुझे
ज़ुल्म-ए-सय्याद की अब ज़रूरत नहीं

दौलतों के इवज़ इश्क़ मिलता है याँ
इश्क़-ए-फरहाद की अब ज़रूरत नहीं

बुर्द-बारी से सब सीख बैठा हूँ मैं
दर्स-ए-अजदाद की अब ज़रूरत नहीं

चाहिए बस वफ़ादार दो चार दोस्त
ढेर तादाद की अब ज़रूरत नहीं

कल तलक जिस के होने से थी ज़िंदगी
उस परी-ज़ाद की अब ज़रूरत नहीं

बे-बसी में कभी वो भी तड़पा था 'ज़ान'
जिस को इमदाद की अब ज़रूरत नहीं

— Zaan Farzaan

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