"आँखों की ख़ातिर"
उस की आँखों की ख़ातिर
या उस की आँखों के वास्ते
उस से जुदा होना एक गुनाह है मुझे
कि हाँ ये भी एक सबब है
उस से जुदा या महजूर न होने का
कि जब जब ख़याल-ए-फ़िराक़
आता है मेरे ज़ेहन में तो मैं
उस की वो आँखें ही तो याद करता हूँ
कि क्या होगा जब छोड़ दूँगा
उन आँखों को दरमियान-ए-सफ़र
क्या वो अफ़सुर्दा आँखें फिर
सह पाएँगी ये महजूरी मेरी
वो आँखें जिन में एक उम्र तलक
खोया रहा हूँ मैं वो आँखें जो
मुझे मुझ से ज़्यादा जानती हैं
वो आँखें जिन में महफ़ूज़ हैं
सारी यादें सारी बातें सारे लम्हें
और सब आलम अपने सुख दुख के
वो आँखें जो मेरे हर ख़्वाब को
अपना ख़्वाब मानती हैं और
जिस के ख़ुद के ख़्वाब मा-तहती हुए हैं
वो आँखें जो अपने माज़ी में
बड़ी परेशान रही हैं वो आँखें
जो मुझे एक उम्मीद से देखती हैं अभी
और अब इस मौजूदा हाल में
एक सुकून तलाशती हैं मुझ में कहीं
वो आँखें जो अभी भी सहमी हुई हैं
पर एक कशिश लौटी है मेरे आने से
वो आँखें जिन से वा'दा कर चुका हूँ मैं
कि कभी सबब-ए-गिर्या न बनूँगा
और कभी दरमियान-ए-सफ़र
न छोड़ूँगा उन्हें















