कोई मेरे लरज़ते हाथ में

काग़ज़ का पुर्ज़ा और क़लम पकड़ा रहा था
कभी कुछ ज़ेर-ए-लब ही बड़बड़ा कर
कोई इसबात में
आँखों की और माथे की जुम्बिश चाहता था
कभी दाँतों में होंटों को दबा कर
कोई रोने की कोशिश कर रहा था

कोई तो चंद लम्हों बा'द अपने
बाल बिखराने गरेबाँ नोचने की फ़िक्र में था
कोई ग़मगीं चेहरा और सियाह मल्बूस में
बेहद हसीं मा'लूम देता था
मेरे अज्दाद के नामों को गँवा कर
कोई मुझ से तअ'ल्लुक़ जोड़ता था

सभी नज़दीक थे मेरे
उधर भाई भतीजे थे
उधर बहनें थीं भांजे थे
फिर उन के बा'द
रिश्ते जोड़ने वाले सफ़-आरा थे

ये लगता था कि कुछ ही देर में
मातम बपा होगा
मैं उन बातों से
बिस्तर पर पड़ा
आँखों को थोड़ी सी खुली रख कर
बड़े दिलचस्प मूड में था

सभी ग़मगीन थे लेकिन
तमन्नाएँ थीं आँखों में

यकायक मैं ने करवट ली
और आँखें खोल कर उठने की कोशिश की
तो देखा
सभी के लब पे मसनूई हँसी थी
चमक आँखों से ग़ाएब थी

— Aabid Adeeb

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Zulf Shayari

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