ज़िंदगी बार हुई जाती है
साँस दुश्वार हुई जाती है
इब्न-ए-मरियम हो अगर कुछ तो करो
रूह बीमार हुई जाती है
तुम मिरे सामने हो और घड़ी की
तेज़ रफ़्तार हुई जाती है
आप की राह में बैठे बैठे
ज़ीस्त बेकार हुई जाती है
फूल क़दमों से हटाओ मेरे
राह पुर-ख़ार हुई जाती है
रोकिए रोकिए सरकार इसे
आँख तलवार हुई जाती है
— Aamir Rahmati















