जो रुका हुआ था रुका रहा जो रुका नहीं उसे रोकना
ये अजब रिवाज़ है इश्क़ का जो रुका नहीं उसे रोकना
मैं कभी कभी हूँ ये सोचता कि हवा को हाथ से रोक लूँ
मैं कभी कभी हूँ ये चाहता जो रुका नहीं उसे रोकना
न मुझे सुकून न नींद ही न मिलेगा चैन ही एक दिन
ये बहुत दिनों मुझे खाएगा जो रुका नहीं उसे रोकना
— Aatish Alok















