बात कुछ यूँँ रहतें हैं सो ग़ज़ल कहतें हैं
तुझ सेे जो नय कहतें है सो ग़ज़ल कहतें हैं
एक मिसरा तक ख़ुद लिख न सके, हम तो बस
आँख तेरी पढ़ते हैं सो ग़ज़ल कहतें हैं
वो जो पीकर मदिरा हैं बहके, गिरते हैं
दीदस हम बहके हैं सो ग़ज़ल कहतें हैं
ये हिज़्र हो कि वस्ल औ' तन्हाई सब के
सब गुज़ारे हमनें हैं सो ग़ज़ल कहतें हैं
तुम उपज हो कंटक के सो जहर ही बो दो
हम सुमन के भवरें हैं सो ग़ज़ल कहते हैं
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